Sunday, May 30, 2010

मंजिल की aur


उम्र के हर पड़ाव पर, सभी के अपने-अपने, अलग-अलग लक्ष्य होते हैं, मंजिलें होती हैं। उच्च शिक्षा, उत्कृष्ट खिलाड़ी, बलिष्ठ तथा सुंदर शरीर, आकर्षक व्यक्तित्व, अच्छी नौकरी, उच्च पद, अपने उद्योग-धंधे में उच्च स्तरीय सफलता, ग्लैमर तथा राजनीति की दुनिया में नाम, मानसिक सुख-शांति, श्री-समृधि, धन-वैभव, मान-सम्मान, आदि मंजिलें हैं, जो हर एक इन्सान पाना चाहता है। लाखो, करोड़ों लोगों में से बिरले ही होते है जिन्हें सब सुख नसीब होते हैं। बाकी को कुछ -न-कुछ आभाव बना ही रहता है।


जीवन के विभिन्न सोपानों के अनुसार अगर व्यक्ति अपनी मंजिलों का चुनाव एवं उन पर अमल सही ढंग से करे तो वह सही मायनों में जीवन सार्थक कर लेगा। सफलता की मंजिलें चढ़ाता हुआ वह समाज में एक सम्मानित मुकाम हासिल कर लेगा। भले ही वह कई मोर्चों पर असफल हो जाये, परुन्त उसे असफलता में भी सफलता का एहसास होगा। उसे सच्ची आत्मा-संतुष्टि का अनुभव होगा।


उम्र के हर पड़ाव पर, हर व्यक्ति की इच्छायें, अपेक्षाएं और लक्ष्य बदलते रहते हैं। युवावस्था में कामिनी, कंचन, पद, प्रतिष्ठा की प्रबल इच्छा रहती है। प्रौढ़ावस्था में परिवार और बच्चों का भविष्य प्राथमिक रहता है। वृधावस्था में आत्मा-संतुष्टि।

अपनी मंजिल की और चलते हुए हम किस पथ का अनुसरण करें? निज पथ का या 'महाजनों एन गतः स पन्थाः।' (अर्थात हमसे पहले महापुरुषों, सफल व्यक्तियों ने जिस पथ का अनुसरण किया है उस पथ पर चलें।) देश, काल और परिस्थियों के आधार पर निज पथ का अनुसरण किया जाना चाहिए, किन्तु सफलता के मूल तत्त्व जो की 'महाजनों एन गतः स पन्थाः' में छिपे होते हैं उन्हें नहीं भूलना चाहिए।

हम क्या बनना चाहते हैं, क्या पाना चाहते हैं, क्या करना चाहते हैं? इश्वर, ने हमें सीमित सांसे दी हैं जिनकी गणना हम कभी नहीं करते, न ही जीवन के लिए सबसे जरुरी इन सांसों पर ध्यान देते हैं। सीमित जीवन में व्यक्ति की असीमित इच्छायें, अभिलाषाएं, तमन्नाएँ जो कभी पूर्ण नहीं हो पातीं। व्यक्ति नित नयी जन्म लेती सांसारिक इच्छायों की मृग तृष्णा में भटकता रहता है। और भटकते ही भटकते उसके जीवन के सुनहरे पल गुजर जाते हैं और कब वृधावस्था आ जाती है उसे पता ही नहीं चलता। जब कभी पुराना एल्बम देखता है, पुराणी फोटो देखकर जब आईने में अपना चेहरा देखता है तो एहसास होता है की अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ। तब वह अपने जीवन के अतीत के चलचित्र को मन ही मन देख मुस्कराता है और लम्बी साँस छोड़कर अनंत आकाश की और देखते हुए कुछ और पाने की आशा करने लगता है। और मान कहता है, 'ऐ मान! कुछ दूर अभी और चलाचल ।'

जिंदगी की अनंत यात्रा में मंजिल कहाँ है ? उम्र के हर मोड़ पर बस पड़ाव ही पड़ाव हैं।

उपरोक्त 'मंजिल की और .... ' के कुछ अंश हैं। लेखक - राम बरन यादव प्रकाशक- रंग प्रकाशन, ३३ बक्षी गली, राजवाडा, इंदौर, म.प्र इंडिया 91-731-2538787, 4068787

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